हम सभी जानते है की दुनिया में मनाये जाने वाला महकाल के त्यौहार की शुरुवात महाकाल बाबा की नगरी उज्जैन से ही होती है और बाबा महकाल से ही होती है और ये वर्षो की परम्परा है, उज्जैन में बाबा महकाल में होली का उत्सव मनाया जाता है इसमें राजा धी राज महकाल बाबा स्वयं होली खेलते है
कहने का तात्पर्य यह है की होली की संध्या के दिन मंदिर के पण्डे पुजारी और यह पर होली खेलते है इस दर्शनार्थियों की भारी भीड़ यह पर देखने को मिलती हैभक्त अबीर गुलाल से एक दूसरे को रंग लगाते है उसके बाद आरती होती है तत्पश्चात होलिका दहन होता है
आरती के बाद यहां होलिका दहन किया गया जाता है और भक्त बाबा के भजनों में झूमते नजर आते हैं।
महकाल बाबा के यहा पर एक दिन पहले होली मनाने कि शुरुवात हो जाती है यह पर परम्परा के अनुसार संध्या आरती में ही महाकाल राजा को रंग लगाया जाता है वह के पुजारी अबीर गुलाल से खूब रंग लगा कर मग्न हो जाते है आरती भी विशेष प्रकार के मंत्रोचरण के साथ होती है ततपशचात हलिका दहन होती है आरती के समय भी बाबा के भक्तो पर होली का खूब रंग चढ़ता है
भजन संध्या - इसके बाद फिर महाकाल बाबा के यह पर भजन संध्या का आयोजन भी किया जाता है जिसमे भक्त खूब झूमते नाचते गाते भी है खूब एक दूसरे को रंग लगाते है
होली के महापर्व को मनाने के लिए विदेशों से भी खूब दर्शनार्थी आते है और खूब धूमधाम से इस त्यौहार को मनाते है यह प्रथा महाकाल मंदिर में बहुत पुराने समय से चली आ रही है

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